वृहद वृक्षारोपण के संकल्प के बीच हरे-भरे पेड़ों पर चल रही आरी, आखिर कब रुकेगा वनों का दोहन और किसकी है जिम्मेदारी

वृहद वृक्षारोपण के संकल्प के बीच कटते हरे-भरे पेड़, वनों पर चल रही आरी, जिम्मेदार खामोश

बड़ा सवाल, आखिर कब रुकेगा वनों का दोहन

उत्तराखंड में एक ओर सरकार और वन विभाग वृहद स्तर पर वृक्षारोपण अभियान चलाकर हरियाली बढ़ाने का दावा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कई क्षेत्रों में हरे-भरे पेड़ों की लगातार हो रही कटाई इन दावों की वास्तविकता पर गंभीर सवाल खड़े कर रही है। पर्यावरण संरक्षण के संकल्प और धरातल पर दिखाई दे रही तस्वीर के बीच का यह विरोधाभास लोगों के लिए चिंता का विषय बन गया है।

नैनीताल और उधम सिंह नगर के वन क्षेत्रों में समय-समय पर हरे-भरे पेड़ों के कटान की शिकायतें सामने आती रही हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई स्थानों पर पेड़ों की अवैध कटाई की सूचना दिए जाने के बावजूद समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हो पाती, जिससे वन संपदा को लगातार नुकसान पहुंच रहा है।

पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि एक परिपक्व वृक्ष तैयार होने में 20 से 50 वर्ष या उससे अधिक समय लग सकता है, जबकि उसे काटने में कुछ ही मिनट लगते हैं। ऐसे में यदि पुराने और स्वस्थ वृक्षों का संरक्षण नहीं किया गया, तो लाखों पौधे लगाने के बावजूद पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना कठिन होगा।

वन संरक्षण से जुड़े जानकारों का मानना है कि वृक्षारोपण तभी सार्थक होगा जब पहले से मौजूद हरे-भरे पेड़ों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। इसके लिए नियमित निगरानी, गश्त, आधुनिक तकनीक का उपयोग, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई तथा स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

क्षेत्र के नागरिकों का कहना है कि जंगल केवल लकड़ी का स्रोत नहीं, बल्कि जल स्रोतों, वन्यजीवों, जैव विविधता और मानव जीवन का आधार हैं। यदि वनों का दोहन इसी प्रकार जारी रहा, तो आने वाले वर्षों में पर्यावरणीय संकट और गहरा सकता है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार हरियाली बढ़ाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रही है, तब वर्षों पुराने हरे-भरे पेड़ों को बचाने की प्रभावी व्यवस्था कब दिखाई देगी? क्या वनों का अवैध दोहन रोकने के लिए जवाबदेही तय होगी, या फिर हर वर्ष वृक्षारोपण और पेड़ों की कटाई का यह विरोधाभास यूं ही चलता रहेगा?

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Author: News 24 Uk Up

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