
वृहद वृक्षारोपण के संकल्प के बीच हरे-भरे पेड़ों पर चल रही आरी, आखिर कब रुकेगा वनों का दोहन और किसकी है जिम्मेदारी?
एक ओर करोड़ों पौधे लगाने के दावे, दूसरी ओर विकास परियोजनाओं और अवैध कटान की भेंट चढ़ रहे वर्षों पुराने वृक्ष
सरकारें हर वर्ष करोड़ों पौधे लगाकर हरित प्रदेश बनाने का संकल्प दोहराती हैं। पर्यावरण संरक्षण के नाम पर वृहद वृक्षारोपण अभियान चलाए जाते हैं, जनप्रतिनिधि और अधिकारी पौधे लगाकर हरियाली का संदेश देते हैं। लेकिन दूसरी ओर हकीकत यह है कि वर्षों पुराने हरे-भरे पेड़ों पर लगातार आरी चल रही है। यही विरोधाभास अब पर्यावरण प्रेमियों और आम नागरिकों के मन में बड़ा सवाल खड़ा कर रहा है कि आखिर वृक्षारोपण और वृक्ष संरक्षण में संतुलन कब स्थापित होगा?
सड़कों के चौड़ीकरण, भवन निर्माण, औद्योगिक परियोजनाओं और अन्य विकास कार्यों के नाम पर बड़ी संख्या में परिपक्व पेड़ों की कटाई की जा रही है। कई स्थानों पर अवैध कटान की शिकायतें भी सामने आती रहती हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि एक विकसित पेड़ को तैयार होने में दशकों लग जाते हैं, जिसकी भरपाई केवल नए पौधे लगाकर तत्काल संभव नहीं है।
पर्यावरणविदों का कहना है कि पौधारोपण तभी सार्थक होगा, जब लगाए गए पौधों के संरक्षण और पहले से मौजूद वृक्षों को बचाने पर समान रूप से ध्यान दिया जाए। यदि एक ओर पौधे लगाए जाएं और दूसरी ओर हजारों पुराने वृक्ष काट दिए जाएं, तो पर्यावरण संरक्षण का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
स्थानीय लोगों का कहना है कि कई बार पेड़ों की कटाई से पहले पर्याप्त जनसुनवाई या पारदर्शी जानकारी भी उपलब्ध नहीं कराई जाती। इससे लोगों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि पर्यावरण संरक्षण की वास्तविक जिम्मेदारी किसकी है और कट रहे वृक्षों का जवाबदेह कौन है?
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ते तापमान, भूजल स्तर में गिरावट और जैव विविधता के संरक्षण के लिए पुराने वृक्षों को बचाना उतना ही आवश्यक है, जितना नए पौधे लगाना। केवल वृक्षारोपण के आंकड़े प्रस्तुत करने से पर्यावरण संरक्षण का लक्ष्य पूरा नहीं होगा, बल्कि लगाए गए पौधों की जीवित रहने की दर और मौजूदा हरित संपदा के संरक्षण पर भी बराबर ध्यान देना होगा।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि वृहद वृक्षारोपण अभियानों के बीच हरे-भरे पेड़ों पर चल रही आरी आखिर कब रुकेगी? क्या विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित किया जा सकेगा, या फिर हरियाली केवल सरकारी अभियानों और कागजों तक ही सीमित रह जाएगी? इन सवालों का उत्तर आने वाले समय में सरकार, वन विभाग, स्थानीय प्रशासन और समाज सभी को मिलकर देना होगा।







